ग्रंथसार
राजसिंहासन का स्वर्ण केवल वैभव नहीं, बल्कि एक ऐसा तपा हुआ उत्तरदायित्व है जो सम्राट के व्यक्तित्व को ही बदल देता है।
शान्तिपर्व · अध्याय 72
संप्रभुता का भार