ग्रंथसार
शासन की डोर जब ढीली पड़ती है, तब मर्यादाओं का पतन निश्चित हो जाता है, यही कुरुक्षेत्र की उस शरशय्या से निकला वह शाश्वत स्वर है जो आज भी सत्ता के गलियारों में गूँजता है।
शान्तिपर्व · अध्याय 73
शासन में शिथिलता के खतरे