ग्रंथसार
राजधर्म केवल शासन का अधिकार नहीं, अपितु एक महायज्ञ है, जिसमें राजा स्वयं की आहुति देकर प्रजा का कल्याण सुनिश्चित करता है।
शान्तिपर्व · अध्याय 82
राजधर्म का आचरण