ग्रंथसार
एक राजा का आंतरिक अनुशासन ही उसके पूरे साम्राज्य की नींव और भाग्य का निर्धारक होता है।
शान्तिपर्व · अध्याय 87
राजा की चारित्रिक दृढ़ता और शक्ति