ग्रंथसार
राजसत्ता का सिंहासन स्वर्ण का भले ही हो, पर उसका भार कल्पान्त के पर्वत जैसा भारी होता है, हे देवरात!
शान्तिपर्व · अध्याय 95
राजसत्ता का उत्तरदायित्व