ग्रंथसार
गंगा की शीतल लहरों में विलीन होता वह करुण दृश्य, जैसे आज भी कुरुक्षेत्र की उस संध्या को हमारे मानस पटल पर जीवंत कर देता हो।
स्त्रीपर्व · अध्याय 26
गंगा में तर्पण