ग्रंथसार
क्या मित्रता का बंधन इतना प्रबल हो सकता है कि वह जीवन के अंतिम सत्य को जानते हुए भी मनुष्य को अधर्म के मार्ग पर अडिग रहने को विवश कर दे?
उद्योगपर्व · अध्याय 123
कर्ण का द्वंद्व और निष्ठा