ग्रंथसार
समय के गर्भ में छिपे कुरुक्षेत्र के उस महाविनाश की आहट आज भी इतिहास की धाराओं में प्रतिध्वनित होती है।
उद्योगपर्व · अध्याय 124
कुरुक्षेत्र की बढ़ती छाया