ग्रंथसार
मित्रता की वेदी पर अपना सर्वस्व होम कर देने वाले सूतपुत्र कर्ण की वह निष्ठा आज भी कुरुक्षेत्र की धूल में जीवंत है।
उद्योगपर्व · अध्याय 128
कर्ण का दुर्योधन के प्रति समर्पण