ग्रंथसार
कुरुक्षेत्र के उस भीषण रण की आहट से न केवल धरातल काँप उठा था, अपितु समस्त प्रकृति भी विनाश के उस भारी सन्नाटे में सिमट गई थी।
उद्योगपर्व · अध्याय 136
विनाश का मंडराता साया