ग्रंथसार
वचन के जाल में फंसा एक वीर योद्धा, कैसे अपनी ही प्रतिज्ञा का कैदी बन गया?
उद्योगपर्व · अध्याय 14
शल्य की विवशता और वचनबद्धता