ग्रंथसार
कुरुक्षेत्र के उस महान रण की पूर्व संध्या का सन्नाटा आज भी समय की पटल पर एक अनसुलझी पहेली बनकर अंकित है।
उद्योगपर्व · अध्याय 152
नियति का मूक साक्षी