ग्रंथसार
नयिमसारण्य के सघन वनों में आज भी श्रीकृष्ण के उस विराट स्वरूप की गूँज सुनाई देती है, जिसने अधर्म की नींव को हिलाकर रख दिया था।
उद्योगपर्व · अध्याय 19
विश्वरूप का दर्शन