ग्रंथसार
वीरता के प्रचंड वेग और धर्म के गहरे द्वंद्व के बीच फंसा कर्ण का जीवन, आज भी हमें कृतज्ञता और सत्य के संघर्ष की एक अनसुलझी पहेली सा प्रतीत होता है।
उद्योगपर्व · अध्याय 63
कर्ण की प्रतिज्ञा और संशय