ग्रंथसार
मृत्यु का वरण करने बैठे दुर्योधन को देखकर कर्ण और शकुनि ने उसके सामने क्षत्रिय धर्म और मित्रता की दुहाई दी।
वनपर्व · अध्याय 248
कर्ण और शकुनि द्वारा दुर्योधन को सांत्वना