ग्रंथसार
द्वैतवन के बचे हुए मृगों ने अश्रुपूर्ण नेत्रों से धर्मराज युधिष्ठिर के स्वप्न में आकर अपने वंश की रक्षा की करुण प्रार्थना की।
वनपर्व · अध्याय 256
द्वैतवन के मृगों का स्वप्न-दर्शन