ग्रंथसार
आश्रम के द्वार पर खड़ी रूपवती द्रौपदी को देखकर सिन्धुराज जयद्रथ कामासक्त हो उठा और उसने अपने मित्र कोटिकास्य को उसका परिचय जानने भेजा।
वनपर्व · अध्याय 258
जयद्रथ द्वारा द्रौपदी को देखना और कोटिकास्य को भेजना