ग्रंथसार
द्रौपदी के संशयों को शांत करते हुए धर्मराज युधिष्ठिर ने कहा कि धर्म कोई व्यापार नहीं है जिसका लाभ-हानि देखकर पालन किया जाए।
वनपर्व · अध्याय 32
युधिष्ठिर द्वारा धर्म की महिमा का प्रतिपादन