ग्रंथसार
अधर्म के कीचड़ में फंसा जब मान का दीपक बुझने को होता है, तब काल का चक्र अपनी गति से न्याय के लिए जाग उठता है।
विराटपर्व · अध्याय 3
द्रौपदी का सौंदर्य और कीचक का लोलुपता