ग्रंथसार
सेवा का अर्थ केवल कर्म करना नहीं, बल्कि स्वयं को ईश्वर के चरणों में समर्पित कर देना है।
भक्त, शिष्य और आश्रम · कथा 10
सेवा: आश्रम का हृदय