ग्रंथसार
जिसकी बुद्धि अपनी सीमाएं जानती है, वही ज्ञान के विस्तार की ओर पहला कदम बढ़ाता है।
चाणक्य नीति · पाठ 2
शिष्य और परामर्श का चयन