ग्रंथसार
धन जीवन का एक साधन मात्र है, जिसका मूल्य उसके संचय में नहीं, बल्कि उसके उचित उपयोग में निहित है।
चाणक्य नीति · पाठ 5
धन और उसका सदुपयोग