ग्रंथसार
सभा में कहा गया एक अपमानजनक वचन केवल दो लोगों के बीच नहीं रहता—कभी-कभी उसकी चोट पूरे समुदाय तक पहुँचती है।
चाणक्य नीति — कथाओं के साथ · पाठ 12
अपमान की बढ़ती आग