ग्रंथसार
गंगा के किनारे निषादराज गुह ने श्रीराम का स्वागत किया, तो उनकी मित्रता का परिचय किसी उपाधि ने नहीं, उनके व्यवहार ने दिया।
चाणक्य नीति — कथाओं के साथ · पाठ 15
पहचान से बढ़कर आचरण