ग्रंथसार
माता अनसूया ने माता सीता को उपहार ही नहीं दिए, उनकी अपनी कहानी सुनने के लिए स्थान भी दिया—और सम्मान की बात यहीं पूरी होती है।
चाणक्य नीति — कथाओं के साथ · पाठ 18
सम्मान में सुनना भी है