ग्रंथसार
हनुमान जी माता सीता तक पहुँच चुके थे, लेकिन अब कठिन प्रश्न था—बोलें कैसे कि उनका भय बढ़े नहीं, भरोसे का रास्ता खुले?
चाणक्य नीति — कथाओं के साथ · पाठ 9
वाणी का उचित क्षण