ग्रंथसार
जो सही है, उसे जानने और उसे जीने के बीच की दूरी कैसे मिटती है—तैत्तिरीय उपनिषद् की एक विदाई हमें यही सिखाती है।
प्रातः श्रवण — जागने के बाद सुनें · पाठ 5
जीवन में उतरती विद्या