ग्रंथसार
प्रतिष्ठित देव की नित्य सेवा ही भक्त को निरंतर ईश्वरीय कृपा से जोड़कर रखती है।
अग्नि पुराण · अध्याय 29
नित्य पूजा और सेवा विधि