ग्रंथसार
देवता का स्वरूप केवल पाषाण नहीं, बल्कि श्रद्धा के योग से जागृत चैतन्य है।
अग्नि पुराण · अध्याय 43
मूर्ति प्रतिष्ठा और देव-आवाहन