ग्रंथसार
शुद्ध आचरण ही मनुष्य को ईश्वर के दिव्य सान्निध्य तक पहुँचाने वाला प्रथम सोपान है।
वराह पुराण · अध्याय 21
आचार-शुद्धि का विधान