ग्रंथसार
अधर्म के उन्माद में चूर रावण के समक्ष जनकात्मजा सीता का तेज किसी प्रज्वलित अग्नि के समान धधक उठा।
अरण्यकाण्ड · सर्ग 48
रावण का दर्प और सीता जी की सिंहिनी जैसी गर्जना