ग्रंथसार
विदा की उस प्रभात-वेला में महर्षि सुतीक्ष्ण ने वन का मार्ग भी दिखाया और लौट आने का स्नेहभरा निमंत्रण भी दिया।
अरण्यकाण्ड · सर्ग 8
महर्षि सुतीक्ष्ण से विदा