ग्रंथसार
जिस पुत्र को प्रजा अपने प्राणों के समान चाहती थी, उसे युवराज बनाकर देखने की अभिलाषा अब वृद्ध महाराज दशरथ के हृदय में प्रबल हो उठी थी।
अयोध्याकाण्ड · सर्ग 1
श्रीराम के दिव्य गुण और युवराज पद का विचार