ग्रंथसार
अयोध्या सामने थी, राजभवन भी वहीं था—पर श्री भरत को लग रहा था, मानो इस नगरी से उसका जीवन ही चला गया हो।
अयोध्याकाण्ड · सर्ग 114
भरत का सूने राजभवन में प्रवेश