ग्रंथसार
पुत्र की अभिलाषा अब यज्ञ का संकल्प बन चुकी थी; किन्तु महाराज दशरथ के सामने सबसे बड़ी सावधानी थी—इतने विशाल अनुष्ठान में कहीं कोई विधि-दोष न रह जाए।
बालकाण्ड · सर्ग 12
अश्व का प्रस्थान