ग्रंथसार
स्वर्ग से उमड़ी धारा कभी शिव की जटाओं में खो गई, कभी ऋषि के भीतर समा गई—पर भगीरथ का संकल्प अडिग रहा।
बालकाण्ड · सर्ग 43
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