ग्रंथसार
देवताओं ने ब्रह्मर्षि कहकर उनका अभिनन्दन कर दिया था, फिर भी महर्षि विश्वामित्र की एक अभिलाषा शेष थी।
बालकाण्ड · सर्ग 65
विश्वामित्र को ब्रह्मर्षि पद की प्राप्ति