ग्रंथसार
जिस वीर के सामने शत्रु ठहर नहीं पाते थे, आज उसी से तारा एक उत्तर पाने के लिए व्याकुल थीं।
किष्किन्धाकाण्ड · सर्ग 20
धराशायी वाली पर तारा का हृदयविदारक विलाप