ग्रंथसार
जिस वीर ने असंख्य शत्रुओं को धरती पर सुलाया था, आज उसी से तारा पूछ रही थीं—मेरी पुकार सुनकर भी आप उठते क्यों नहीं?
किष्किन्धाकाण्ड · सर्ग 23
तारा का दारुण विलाप