ग्रंथसार
जिस वालि के पराक्रम से वन काँपता था, आज उसी की अन्तिम यात्रा में शोक से काँपते हाथों को अपना कर्तव्य निभाना था।
किष्किन्धाकाण्ड · सर्ग 25
वालि का अन्तिम संस्कार