ग्रंथसार
जिन जले हुए पंखों से सम्पाती उड़ नहीं सकते थे, उन्हीं की कथा सुनाते-सुनाते उन्होंने वानरों को समुद्र पार की आशा दे दी।
किष्किन्धाकाण्ड · सर्ग 58
सम्पाती द्वारा सीता के स्थान का उद्घाटन