ग्रंथसार
जिन पंखों के लौटने की आशा में सम्पाती ने वर्षों तक जीवन सँभाले रखा था, वे वानरों के सामने ही फिर उगने लगे।
किष्किन्धाकाण्ड · सर्ग 63
सम्पाती के पंखों का पुनः उगना और वानरों का प्रस्थान