रामायण · सर्ग 2

The Poet's Vision

Valmiki sees the sorrow of the krauncha birds

सुबह का समय है... वाल्मीकि मुनि नदी के तट की ओर चले जा रहे हैं। मार्ग जाना-पहचाना है। पैर सहज ही आगे बढ़ रहे हैं, और मन में वही विशाल कथा घूम रही है जो उन्होंने नारद से सुनी थी।

खुला आकाश है... शांत सुबह है... मुनि धीरे-धीरे आगे बढ़ रहे हैं।

तभी उनकी आँखों के सामने कुछ घटता है। एक निर्दोष पक्षी घायल होकर गिरता है... और उसका साथी अकेला रह जाता है।

वाल्मीकि वहीं ठिठक जाते हैं। उनका शरीर स्थिर है, पर भीतर कुछ टूट गया है। कोई विचार नहीं... केवल करुणा। उस छोटे-से जीव की पीड़ा अब किसी और की पीड़ा नहीं लगती। वह मुनि के अपने हृदय में उतर आई है।

कुछ देर पहले तक उनके भीतर राम की कथा की रूपरेखा थी। अब उस रूपरेखा को करुणा की गर्माहट मिल रही है। हृदय पिघलता है... और भीतर रुके हुए शब्द बाहर आने का मार्ग खोजने लगते हैं...

The first verse and the birth of the poet

वाल्मीकि मुनि नदी के तट से आश्रम की ओर लौट रहे हैं... पर इस बार उनके भीतर कुछ ऐसा है, जो जाते समय नहीं था।

करुणा हृदय में गहराई तक उतर चुकी है। अब वह अपना आकार खोज रही है। इतना गहरा भाव साधारण बातचीत में नहीं समाता। उसे लय चाहिए... ऐसी वाणी, जो नपी हुई हो, संतुलित हो, ठहरी हुई हो। जिसे स्मरण रखा जा सके। जिसे आगे कहा जा सके।

और तभी... वह वाणी फूट पड़ती है। दुःख और करुणा लय में ढल जाते हैं।

कुछ देर पहले वाल्मीकि एक मुनि थे, जिन्होंने नारद से एक महान कथा सुनी थी। अब उनके पास वह वाणी है, जो उस विशाल कथा का भार उठा सकती है।

पहले एक प्रश्न उठा था—भला मनुष्य कैसा होता है? फिर उत्तर में राम का जीवन सामने आया। और अब करुणा से जन्मी यह नपी हुई वाणी मिल गई है।

सब कुछ जुड़ चुका है... अब राम की कथा कही जा सकती है।

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