ग्रंथसार
अशोकवन उजड़ चुका था, पर उसके निकट खड़ा ऊँचा चैत्यप्रासाद अब भी अक्षत था—श्री हनुमान की दृष्टि अब उसी पर पड़ी।
सुन्दरकाण्ड · सर्ग 43
चैत्य प्रासाद का विध्वंस