ग्रंथसार
इन्द्रजित् जिस निश्चेष्टता को अपनी विजय मान रहा था, उसी के बीच विभीषण को अब भी जीवन और धैर्य का आधार दिखाई दे रहा था।
युद्धकाण्ड · सर्ग 46
इन्द्रजित् का लंका लौटना और वानरों का शोक