ग्रंथसार
इस संग्राम में विजय केवल प्रहार करने से नहीं, प्रहार सहकर फिर उठ खड़े होने के साहस से मिली।
युद्धकाण्ड · सर्ग 77
शोणिताक्ष और यूपाक्ष का वध