ग्रंथसार
इन्द्रजीत अदृश्य होकर बाण बरसा रहा था, पर उस घोर संकट में भी भगवान श्रीराम ने अपने पराक्रम के साथ युद्ध की मर्यादा भी अडिग रखी।
युद्धकाण्ड · सर्ग 80
इन्द्रजीत का यज्ञ और रणभूमि में प्रवेश