ग्रंथसार
प्रभु के नाम की महिमा अपरंपार है, जो जपते ही मनुष्य को संसार के बंधनों से मुक्त कर देती है।
उत्तरकाण्ड · प्रसंग 15
भक्ति का मार्ग और अंतिम स्तुति