ग्रंथसार
भगवान राम राज्य केवल एक शासन व्यवस्था नहीं, बल्कि प्रेम और न्याय का एक साक्षात् स्वरूप था।
उत्तरकाण्ड · प्रसंग 17
राम राज्य का भव्य विस्तार