ग्रंथसार
कागभुशुण्डि के मुख से निकली भक्ति की गाथा एक ऐसे अमृत के समान है जो जीवात्मा के सभी दुखों का हरण कर लेती है।
उत्तरकाण्ड · प्रसंग 4
कागभुशुण्डि का ज्ञान और अनुभव